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CLASS 8 • SANSKRIT • CHAPTER 13

वर्णोच्चारण-शिक्षा १

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Quick answer
‘वर्णोच्चारण-शिक्षा १’ कक्षा 8 संस्कृत दीपकम् का तेरहवाँ पाठ है। इसमें वाणी उत्पन्न करने वाले चार शारीरिक तन्त्र, छह उच्चारण-स्थान—कण्ठ, तालु, मूर्धा, दन्त, ओष्ठ और नासिका—तथा स्थान और करण का अंतर समझाया गया है।
Key points
  • वागुत्पत्ति में नाभि-प्रदेश, उरः, कण्ठ-बिल और आस्य की भूमिका होती है।
  • उच्चारण के छह स्थान कण्ठ, तालु, मूर्धा, दन्त, ओष्ठ और नासिका हैं।
  • स्थानम् वर्ण का उच्चारण-स्थल है और करणम् उच्चारण में प्रयुक्त अंग है।
  • तालव्य के लिए जिह्वामध्यम्, मूर्धन्य के लिए जिह्वोपाग्रम् और दन्त्य के लिए जिह्वाग्रम् प्रमुख करण हैं।
  • आभ्यन्तर-प्रयत्न तीसरा तत्त्व है; इस पाठ में स्थान और करण का मुख्य अध्ययन होता है।

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वर्णोच्चारण-शिक्षा १ — त्रयोदशः पाठः

कक्षा ८ | संस्कृत | NCERT दीपकम् | पाठ १३

सीधे शब्दों में

‘वर्णोच्चारण-शिक्षा १’ संस्कृत के वर्णों के शुद्ध उच्चारण का विज्ञान समझाता है। वाणी बनने में नाभि-प्रदेश की मांसपेशियाँ, उरः (फेफड़े और श्वसन-तन्त्र), कण्ठ-बिल (स्वरयन्त्र) तथा आस्य (मुख-नासिका) की भूमिका होती है। वर्ण के उच्चारण में स्थानम् (उच्चारण का स्थान), करणम् (उच्चारण में प्रयुक्त अंग) और आभ्यन्तर-प्रयत्नः महत्त्वपूर्ण हैं; इस पाठ का मुख्य अध्ययन स्थान और करण है।

अधिगम-उद्देश्य

पाठ पूरा करने के बाद विद्यार्थी (१) वागुत्पत्ति की प्रक्रिया क्रम से समझा सकेंगे, (२) छह उच्चारण-स्थान पहचानेंगे, (३) स्थान और करण का अंतर बताएँगे, (४) जिह्वा के भागों को संबंधित ध्वनियों से जोड़ेंगे, (५) कण्ठ्य, तालव्य, मूर्धन्य, दन्त्य, ओष्ठ्य तथा नासिक्य ध्वनियों का अभ्यास करेंगे और (६) पाठ-आधारित प्रश्नों के उत्तर संस्कृत में लिखेंगे।

पाठ का हिन्दी सार

पिछले पाठ में हमने सीखा कि शब्दों का स्पष्ट उच्चारण आवश्यक है। किसी शब्द का उच्चारण तभी ठीक होगा जब उसके प्रत्येक वर्ण का उच्चारण उचित ढंग से किया जाए। वर्णोच्चारण में केवल मुँह ही काम नहीं करता; शरीर के श्वसन और ध्वनि-निर्माण से संबंधित अन्य अंग भी सहयोग करते हैं।

वागुत्पत्ति के चार तन्त्र

क्रम संस्कृत पद शरीर का भाग मुख्य कार्य
१ नाभि-प्रदेशः — मांसपेशी-बल-तन्त्रम् पेट और श्वसन से जुड़ी मांसपेशियाँ श्वसन के लिए आवश्यक मांसपेशीय क्रिया
२ उरः — वायु-बल-तन्त्रम् छाती, फेफड़े, डायफ्राम बाहर निकलती वायु का प्रवाह
३ कण्ठ-बिलः — ध्वनि-तन्त्रम् स्वरयन्त्र और स्वरतन्त्रियाँ घोषयुक्त ध्वनियों के लिए स्वरकम्पन
४ आस्यम् — उच्चारण-तन्त्रम् मुख तथा नासिका का मार्ग वायु/ध्वनि को अलग-अलग वर्णों का रूप देना

सरल क्रम: श्वसन-संबंधी मांसपेशियाँ → फेफड़ों से बाहर आती वायु → स्वरयन्त्र → मुख/नासिका में ध्वनि का रूपान्तरण।

वैज्ञानिक सावधानी: सभी वर्णों के लिए स्वरतन्त्रियों का कम्पन समान नहीं होता; कुछ ध्वनियाँ अघोष होती हैं। ऊपर का क्रम पाठ की शिक्षण-सरलीकृत व्याख्या है।

वर्णोच्चारण के तीन तत्त्व

१. स्थानम्: वायु-प्रवाह के साथ वर्ण का उच्चारण जहाँ होता है, वह स्थान।
२. करणम्: जिस चल अथवा सहायक अंग से उच्चारण होता है, वह करण।
३. आभ्यन्तर-प्रयत्नः: उच्चारण के समय अंगों के परस्पर स्पर्श, समीपता आदि का प्रकार; इस पाठ में इसका केवल परिचय है।

स्थानम् और करणम् में अंतर

उदाहरण: ‘त्’ बोलते समय ऊपरी दाँतों के निकट का क्षेत्र स्थानम् है, और जीभ का अग्रभाग करणम् है। ‘च्’ बोलते समय तालु स्थान और जिह्वा का मध्यभाग करण होता है।

मुरली-दृष्टान्त: बाँसुरी में हवा विभिन्न छिद्रों और उँगलियों की स्थिति के अनुसार अलग स्वर बनाती है। इसी प्रकार मुख के विभिन्न स्थान और उच्चारण-अंग मिलकर वर्णों का रूप निर्धारित करते हैं। यह केवल समझाने वाला उदाहरण है; मानव वाणी की वास्तविक क्रिया इससे अधिक जटिल है।

छह उच्चारण-स्थान

स्थान हिन्दी नाम मुख्य वर्ण-समूह के उदाहरण
कण्ठः कण्ठ अ, आ, क-वर्ग, ह
तालु तालु इ, ई, च-वर्ग, य, श
मूर्धा मूर्धा/ऊपरी तालु का पश्च भाग ऋ, ॠ, ट-वर्ग, र, ष
दन्ताः दाँत ऌ, त-वर्ग, ल, स
ओष्ठौ होंठ उ, ऊ, प-वर्ग
नासिका नाक अनुनासिक वर्णों के उच्चारण में सहयोग

विशेष ध्यान: कुछ स्वरों के संयुक्त उच्चारण-स्थान भी होते हैं: ए, ऐ कण्ठतालव्य; ओ, औ कण्ठोष्ठ्य। व दन्तोष्ठ्य माना जाता है। वर्गीय अनुनासिकों (ङ्, ञ्, ण्, न्, म्) में उनके मुख्य मुख-स्थान के साथ नासिका का भी उपयोग होता है। ‘नासिका’ को सभी अनुनासिक वर्णों का एकमात्र स्थान न समझें।

करणम् — उच्चारण का साधन

करणम् वह अंग या अंग का भाग है जो किसी उच्चारण-स्थान के साथ क्रिया करके वर्ण बनाने में सहायता करता है।

जिह्वा के तीन प्रमुख भाग

स्थान करण उदाहरण
तालु जिह्वामध्यम् — जीभ का मध्य भाग च्, छ्, ज्, झ्, ञ्
मूर्धा जिह्वोपाग्रम् — जीभ के अग्रभाग के पीछे का भाग ट्, ठ्, ड्, ढ्, ण्
दन्ताः जिह्वाग्रम् — जीभ का अग्रभाग त्, थ्, द्, ध्, न्

स्वस्थानमेव करणम्

पाठ में कण्ठ्य, ओष्ठ्य और नासिक्य वर्णों के लिए संबंधित स्थान के ही भागों को करणम् बताया गया है। उदाहरण के लिए दोनों ओष्ठों की परस्पर क्रिया से प्, ब्, म् जैसे वर्ण बनते हैं। तालव्य, मूर्धन्य और दन्त्य वर्णों में जिह्वा की भूमिका अधिक प्रत्यक्ष होती है।

संस्कृत वर्ण-समूहों का अभ्यास

समूह वर्ण
क-वर्गः क ख ग घ ङ
च-वर्गः च छ ज झ ञ
ट-वर्गः ट ठ ड ढ ण
त-वर्गः त थ द ध न
प-वर्गः प फ ब भ म
अन्तःस्थाः य र ल व
ऊष्माणः श ष स ह

अभ्यास-विधि: हर समूह को धीरे-धीरे बोलें; जीभ, दाँत, तालु और होंठों की स्थिति पर ध्यान दें। शिक्षक के सही उच्चारण से तुलना करें।

मुख्य पारिभाषिक शब्दार्थ

संस्कृत हिन्दी English
शिक्षा वर्णोच्चारण-शास्त्र Phonetics
वर्णः सबसे छोटी भाषिक ध्वनि की इकाई (पाठ-संदर्भ) Speech sound
स्वरः स्वर Vowel
व्यञ्जनम् व्यंजन Consonant
स्पर्शः स्पर्श-वर्ण Stop consonant
आस्यम् मुख और नासिका सहित उच्चारण क्षेत्र Articulatory region
कण्ठ-बिलम् स्वरयन्त्र Larynx
उरः छाती Chest
श्वासकोशः फेफड़ा Lung
नाभि-प्रदेशः पेट का मध्य क्षेत्र Abdominal region
मांसपेश्यः मांसपेशियाँ Muscles
वायु-बल-तन्त्रम् वायु-दाब व्यवस्था Air-pressure system
ध्वनि-तन्त्रम् ध्वनि निर्माण व्यवस्था Phonation system
उच्चारण-तन्त्रम् वर्ण निर्माण व्यवस्था Articulatory system
स्थानम् उच्चारण का स्थान Place of articulation
करणम् उच्चारण में प्रयुक्त अंग Articulator
जिह्वा जीभ Tongue
जिह्वामध्यम् जीभ का मध्य Tongue middle
जिह्वोपाग्रम् जीभ के अग्रभाग के पीछे का हिस्सा Subapical region
जिह्वाग्रम् जीभ का अग्रभाग Tongue tip
नासिका नाक Nose
आभ्यन्तर-प्रयत्नः आंतरिक उच्चारण-प्रयास Manner of articulation

अभ्यासात् जायते सिद्धिः — पाठ्यपुस्तक-आधारित प्रश्नोत्तर

अभ्यास १ — एकपदेन / द्विपदेन उत्तराणि

(क) उरसि किं तन्त्रं भवति?
उत्तरम्: वायु-बल-तन्त्रम्।

(ख) नाभिप्रदेशे स्थिताः मांसपेश्यः किं नोदयन्ति?
उत्तरम्: उरः।

(ग) आस्यस्य आभ्यन्तरे वर्णानाम् उत्पत्त्यर्थं द्वितीयं तत्त्वं किम् अस्ति?
उत्तरम्: करणम्।

(घ) आस्ये कति स्थानानि सन्ति?
उत्तरम्: षट्।

(ङ) वर्णोच्चारणे तृतीयं तत्त्वं किम् अस्ति?
उत्तरम्: आभ्यन्तर-प्रयत्नः।

अभ्यास २ — पूर्णवाक्येन उत्तराणि

(क) वर्णोच्चारणार्थं शरीरस्य कानि अङ्गानि उपयुज्यन्ते?
उत्तरम्: वर्णोच्चारणार्थं नाभिप्रदेशः, उरः, कण्ठ-बिलम्, आस्यम् च उपयुज्यन्ते।

(ख) वर्णानाम् उच्चारणस्थानानि कानि सन्ति?
उत्तरम्: कण्ठः, तालु, मूर्धा, दन्ताः, ओष्ठौ, नासिका च उच्चारणस्थानानि सन्ति।

(ग) स्थानम् इति किम्?
उत्तरम्: यत्र वर्णस्य उच्चारणं भवति तत् स्थानम् इति कथ्यते।

(घ) करणम् इति किम्?
उत्तरम्: वर्णोच्चारणे यत् अङ्गम् उपकरणरूपेण कार्यं करोति तत् करणम् इति कथ्यते।

(ङ) तालव्यवर्णानां करणं किम्?
उत्तरम्: तालव्यवर्णानां करणं जिह्वामध्यम् अस्ति।

अभ्यास ३ — स्थान–करण मिलान

स्थानम् करणम्
तालु जिह्वामध्यम्
मूर्धा जिह्वोपाग्रम्
दन्ताः जिह्वाग्रम्
कण्ठः स्वस्थानम्
ओष्ठौ स्वस्थानम्
नासिका स्वस्थानम्

अभ्यास ४ — उच्चारण-स्थान पहचानिए

  • क् — कण्ठ्यः।
  • च् — तालव्यः।
  • ट् — मूर्धन्यः।
  • त् — दन्त्यः।
  • प् — ओष्ठ्यः।
  • ए — कण्ठतालव्यः।
  • ओ — कण्ठोष्ठ्यः।
  • व् — दन्तोष्ठ्यः।

अभ्यास ५ — शुद्धोच्चारण-अभ्यास

क-वर्गः: क ख ग घ ङ।
च-वर्गः: च छ ज झ ञ।
ट-वर्गः: ट ठ ड ढ ण।
त-वर्गः: त थ द ध न।
प-वर्गः: प फ ब भ म।

प्रत्येक वर्ण को सुनें, बोलें और उसके उच्चारण-स्थान का नाम लिखें। यह क्रियात्मक अभ्यास है; लिखित उत्तर के साथ मौखिक अभ्यास भी आवश्यक है।

सत्यापन-नोट: ऊपर अभ्यास १ के प्रश्न पाठ्यपुस्तक-संदर्भ से मिलाए गए हैं; शेष शीर्षकों में पाठ्य-विषयों के अनुरूप मार्गदर्शक अभ्यास दिए गए हैं, मूल पुस्तक के प्रत्येक प्रश्न का शब्दशः प्रतिलेखन नहीं।

अतिरिक्त अभ्यास — रिक्तस्थानानि

१. उरसि ______ तन्त्रं भवति। उत्तरम्: वायु-बल-तन्त्रम्।
२. आस्ये ______ उच्चारणस्थानानि सन्ति। उत्तरम्: षट्।
३. तालव्यवर्णानां करणं ______ अस्ति। उत्तरम्: जिह्वामध्यम्।
४. मूर्धन्यवर्णानां करणं ______ अस्ति। उत्तरम्: जिह्वोपाग्रम्।
५. दन्त्यवर्णानां करणं ______ अस्ति। उत्तरम्: जिह्वाग्रम्।

अतिरिक्त बहुविकल्पीय प्रश्न

१. स्वरयन्त्र का संस्कृत नाम क्या है? (क) उरः (ख) कण्ठ-बिलम् (ग) ओष्ठः। उत्तर: ख।
२. तालव्य वर्णों का करण क्या है? (क) जिह्वामध्यम् (ख) जिह्वाग्रम् (ग) नासिका। उत्तर: क।
३. ‘त्’ किस स्थान का वर्ण है? (क) मूर्धा (ख) दन्ताः (ग) ओष्ठौ। उत्तर: ख।
४. ‘प्’ किस स्थान का वर्ण है? (क) ओष्ठौ (ख) तालु (ग) कण्ठः। उत्तर: क।
५. आस्य में कितने उच्चारण-स्थान पढ़ाए गए हैं? (क) चार (ख) पाँच (ग) छह। उत्तर: ग।

सामान्य गलतियाँ

  • स्थानम् और करणम् समानार्थी नहीं हैं।
  • तालव्य में जिह्वामध्यम्, मूर्धन्य में जिह्वोपाग्रम् और दन्त्य में जिह्वाग्रम् को याद रखें।
  • नासिका का योगदान केवल एक अलग व्यंजन-वर्ग तक सीमित नहीं; कई अनुनासिक ध्वनियों में नासिकीय वायु-प्रवाह होता है।
  • कण्ठ-बिल में स्वरतन्त्रियों का कम्पन सभी वर्णों के लिए समान नहीं होता।
  • इस पाठ में आभ्यन्तर-प्रयत्न का परिचय है; विस्तृत अध्ययन आगे के स्तर पर होता है।

पुनरावृत्ति

चार तन्त्र: नाभि-प्रदेश, उरः, कण्ठ-बिलम्, आस्यम्। छह स्थान: कण्ठ, तालु, मूर्धा, दन्त, ओष्ठ, नासिका। तीन तत्त्व: स्थान, करण, आभ्यन्तर-प्रयत्न। जिह्वा-करण: मध्य, उपाग्र, अग्र। मुख्य उद्देश्य: प्रत्येक वर्ण का स्पष्ट और शुद्ध उच्चारण।

गतिविधि

एक दर्पण के सामने प, त, ट, च का उच्चारण करें। होंठ और जीभ की स्थिति देखें। शिक्षक या विश्वसनीय उच्चारण रिकॉर्डिंग से तुलना करें। केवल दर्पण से जीभ के सभी अंदरूनी स्थान स्पष्ट नहीं दिखते; मौखिक मार्गदर्शन भी लें।

स्रोत और सत्यापन-सीमा

प्राथमिक स्रोत: NCERT, दीपकम्, कक्षा ८, त्रयोदशः पाठः, मूल PDF: https://www.evidyarthi.in/wp-content/uploads/2020/10/cbse-class-8-deepakam-sanskrit-book-chapter-13.pdf । पाठ-पाठ्य संदर्भ: https://shikshamitra.ai/learn/lesson/2c004299-007f-4ea7-88e5-1bba8917ab28/ । यह स्वतंत्र अध्ययन-मार्गदर्शिका है; पाठ के मुख्य सिद्धान्तों, स्थान-करण और चयनित प्रश्नों का मिलान किया गया है, लेकिन मूल पुस्तक के सभी पाँच अभ्यास-समूहों के प्रत्येक प्रश्न का शब्दशः सत्यापन शेष है।

Frequently asked questions

‘वर्णोच्चारण-शिक्षा १’ में क्या पढ़ाया गया है?

वाणी उत्पन्न होने की प्रक्रिया, चार तन्त्र, छह उच्चारण-स्थान और स्थान–करण का अंतर समझाया गया है।

वागुत्पत्ति के चार तन्त्र कौन-से हैं?

नाभि-प्रदेश का मांसपेशी-बल-तन्त्र, उरः का वायु-बल-तन्त्र, कण्ठ-बिल का ध्वनि-तन्त्र और आस्य का उच्चारण-तन्त्र।

संस्कृत में छह उच्चारण-स्थान कौन-से हैं?

कण्ठः, तालु, मूर्धा, दन्ताः, ओष्ठौ और नासिका।

स्थानम् और करणम् में क्या अंतर है?

स्थानम् वह क्षेत्र है जहाँ वर्ण का उच्चारण होता है; करणम् वह अंग या अंग का भाग है जो उच्चारण में सहायता करता है।

तालव्य, मूर्धन्य और दन्त्य वर्णों के करण क्या हैं?

क्रमशः जिह्वामध्यम्, जिह्वोपाग्रम् और जिह्वाग्रम्।

आभ्यन्तर-प्रयत्न क्या है?

वर्ण बोलते समय उच्चारण-अंगों के स्पर्श, समीपता और अन्य आंतरिक क्रिया का प्रकार आभ्यन्तर-प्रयत्न कहलाता है।

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