- यह हितोपदेश-प्रेरित वीरवर-कथा का दूसरा और अंतिम भाग है।
- वीरवर की पत्नी वेदरता, पुत्र शक्तिधर और पुत्री वीरवती कथा के मुख्य पात्र हैं।
- देवी सर्वमङ्गला राजा को रोककर वीरवर के परिवार को पुनर्जीवन देती हैं।
- अंत में राजा शूद्रक वीरवर को समग्र कर्णाटप्रदेश प्रदान करता है।
- कर्तृवाच्य, कर्मवाच्य और भाववाच्य का अंतर इस पाठ का प्रमुख व्याकरण विषय है।
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सन्निमित्ते वरं त्यागः (ख-भागः) — एकादशः पाठः
कक्षा ८ | संस्कृत | NCERT दीपकम् | पाठ ११
पाठ का सीधा उत्तर
‘सन्निमित्ते वरं त्यागः’ का अर्थ है अच्छे उद्देश्य के लिए किया गया त्याग श्रेष्ठ माना जाता है। यह हितोपदेश से प्रेरित वीरवर-कथा का दूसरा और अंतिम भाग है। राजा शूद्रक के जीवन की रक्षा के लिए वीरवर का परिवार अत्यंत कठिन बलिदान करता है। राजा भी अपने सेवक के लिए जीवन देने को तैयार हो जाता है। देवी सर्वमङ्गला प्रकट होकर सभी को पुनर्जीवन देती हैं। अंत में राजा वीरवर को समग्र कर्णाटप्रदेश प्रदान करता है।
संवेदनशील प्रसंग: मूल कथा में मानव-बलि और आत्मघात के वर्णन हैं। वे केवल प्राचीन साहित्यिक कथा की घटनाएँ हैं, वास्तविक जीवन में अनुकरण योग्य व्यवहार नहीं। किसी भी उद्देश्य के लिए स्वयं या दूसरे को हानि पहुँचाना उचित नहीं है।
अधिगम-उद्देश्य
- क-भाग और ख-भाग की घटनाओं को क्रम से जोड़ना।
- वीरवर, शक्तिधर, वेदरता, वीरवती, शूद्रक और सर्वमङ्गला की भूमिकाएँ समझना।
- शीर्षक के नीति-श्लोक का पदच्छेद, अन्वय और भावार्थ करना।
- कर्तृवाच्य, कर्मवाच्य और भाववाच्य में अंतर बताना।
- प्रश्ननिर्माण, सर्वनाम-संदर्भ, वाक्यान्वय और संधि का अभ्यास करना।
- कथा के नैतिक संदेश की विवेकपूर्ण समीक्षा करना।
पिछले पाठ का पुनरावलोकन — क-भागः
शोभावती के राजा शूद्रक की सेवा में वीरवर नामक राजपुत्र नियुक्त था। उसे प्रतिदिन चार सौ स्वर्णमुद्राएँ मिलती थीं। आधा धन देवकार्य में, एक चौथाई जरूरतमंदों में और शेष एक चौथाई परिवार के लिए देता था। वह दिन-रात राजद्वार की रक्षा करता था। एक रात राजा को किसी स्त्री का रोना सुनाई दिया। राजा के आदेश पर वीरवर वहाँ पहुँचा और राजलक्ष्मी से मिला। उसने बताया कि राजा की आयु केवल तीन दिन शेष है; देवी सर्वमङ्गला को अपनी सर्वप्रिय वस्तु समर्पित करने पर राजा को सौ वर्ष की आयु मिल सकती है। राजा छिपकर यह वार्ता सुनता है।
ख-भागः — कथा का क्रमवार हिन्दी सार
१. वीरवर घर लौटता है
वीरवर अपने घर जाकर सोई हुई पत्नी वेदरता, पुत्र शक्तिधर और पुत्री वीरवती को जगाता है। वह राजलक्ष्मी की बात बताता है। परिवार समझता है कि वीरवर की सर्वप्रिय वस्तु उसका पुत्र शक्तिधर है।
२. शक्तिधर का उत्तर
शक्तिधर प्रसन्नतापूर्वक अपने पिता से कहता है कि श्रेष्ठ उद्देश्य के लिए त्याग करना चाहिए। वह नीति-श्लोक सुनाता है—‘धनानि जीवितञ्चैव परार्थे प्राज्ञ उत्सृजेत् ...’। इस प्रसंग में बालक का साहस और पारिवारिक निष्ठा दिखाई जाती है, पर आधुनिक नैतिक दृष्टि से बच्चे की सुरक्षा सर्वोपरि है।
३. वेदरता और वीरवती का मत
वेदरता अपने परिवार की परंपरा और कर्तव्य की बात करती है। वीरवती अपने पिता और भाई की निष्ठा पर गर्व व्यक्त करती है। चारों देवी सर्वमङ्गला के मंदिर जाते हैं।
४. मंदिर का कठिन प्रसंग
वीरवर देवी की पूजा करता है और राजा के कल्याण की प्रार्थना करता है। मूल कथा में पुत्र के बलिदान के बाद वीरवर, उसकी पत्नी और पुत्री भी अपने प्राण त्याग देते हैं। यह एक दुखद, चरम साहित्यिक प्रसंग है; इसका अनुकरण नहीं करना चाहिए। संकट का समाधान हिंसा या आत्महानि नहीं है।
५. राजा शूद्रक की करुणा
राजा यह सब गुप्त रूप से देख रहा होता है। वह सोचता है कि इतने निष्ठावान सेवक और उसके परिवार के बिना राज्य का क्या मूल्य है। वह भी अपना जीवन देने को उद्यत होता है। इससे राजा की भृत्यवात्सल्यम्—सेवक के प्रति स्नेह और उत्तरदायित्व—प्रकट होता है।
६. देवी सर्वमङ्गला का प्रकट होना
देवी राजा का हाथ रोकती हैं। वह राजा की उदारता और सेवक के प्रति प्रेम से प्रसन्न होती हैं। राजा अपने लिए धन या विजय नहीं, बल्कि वीरवर तथा उसके पूरे परिवार का जीवन माँगता है। देवी सभी को पुनर्जीवित कर देती हैं और अदृश्य हो जाती हैं।
७. कथा का अंत
अगले दिन वीरवर फिर राजद्वार पर सेवा करता मिलता है। राजा उससे रात की घटना पूछता है। वीरवर विनम्रता से कहता है कि कोई विशेष बात नहीं हुई। राजा उसके आचरण से प्रसन्न होकर उसे समग्रकर्णाटप्रदेशम् प्रदान करता है। कथा का समापन निष्ठा, उदारता और पारस्परिक उत्तरदायित्व के संदेश से होता है।
पात्र-परिचय
| पात्र | परिचय |
|---|---|
| वीरवरः | राजा शूद्रक का कर्तव्यनिष्ठ राजसेवक |
| शक्तिधरः | वीरवर का पुत्र |
| वेदरता | वीरवर की पत्नी |
| वीरवती | वीरवर की पुत्री |
| शूद्रकः | शोभावती का राजा |
| सर्वमङ्गला | कथा में प्रकट होने वाली देवी |
| राजलक्ष्मीः | राजा पर आने वाले संकट की सूचना देने वाली दिव्य स्त्री |
शीर्षक का नीति-श्लोक
धनानि जीवितञ्चैव परार्थे प्राज्ञ उत्सृजेत्।
सन्निमित्ते वरं त्यागो विनाशे नियते सति॥
पदच्छेदः: धनानि, जीवितम्, च, एव, परार्थे, प्राज्ञः, उत्सृजेत्। सन्निमित्ते, वरम्, त्यागः, विनाशे, नियते, सति।
अन्वयः: प्राज्ञः धनानि जीवितं च एव परार्थे उत्सृजेत्। विनाशे नियते सति सन्निमित्ते त्यागः वरम्।
शब्दार्थ: धनानि = धन-संपत्तियाँ; जीवितम् = जीवन; परार्थे = दूसरों के हित के लिए; प्राज्ञः = बुद्धिमान व्यक्ति; उत्सृजेत् = त्याग करना चाहिए; सन्निमित्ते = श्रेष्ठ उद्देश्य होने पर; वरम् = बेहतर; विनाशे नियते सति = नाश निश्चित होने पर।
हिन्दी भावार्थ: नीति-श्लोक में कहा गया है कि विवेकी व्यक्ति दूसरों के कल्याण के लिए त्याग का भाव रखता है। जब जीवन नश्वर है, तब श्रेष्ठ उद्देश्य के लिए त्याग को महत्त्व दिया गया है।
आधुनिक नैतिक समझ: दूसरों की सहायता समय, श्रम, धन, ज्ञान, सहयोग और साहस से की जा सकती है। इस श्लोक को किसी बच्चे के बलिदान, आत्महत्या या हिंसा का निर्देश नहीं मानना चाहिए।
द्वितीय नीति-श्लोक — राजा का विचार
पाठ में राजा के विचार से जुड़ा दूसरा श्लोक ‘जायन्ते च म्रियन्ते च मादृशाः क्षुद्रजन्तवः ...’ से आरम्भ होता है। इसमें राजा साधारण जीवन और असाधारण परोपकार की तुलना करता है। इसका भाव है कि जीवन का मूल्य दूसरों के हित में किए गए कार्यों से बढ़ता है।
पाठ्य-सटीकता: दूसरे श्लोक का पूरा संस्कृत पाठ यहाँ अनुमान से नहीं दिया गया है; शुद्ध पाठ के लिए मूल NCERT पुस्तक देखें।
महत्त्वपूर्ण शब्दार्थ
| संस्कृत पद | हिन्दी अर्थ |
|---|---|
| आवासम् | घर |
| निद्रालसाम् | नींद से अलसाई हुई |
| दुहितरम् | पुत्री को |
| अवर्णयत् | वर्णन किया |
| सानन्दम् | प्रसन्नतापूर्वक |
| आह | कहा |
| विनियोगः | उपयोग, नियोजन |
| परमश्लाघ्यः | अत्यंत प्रशंसनीय |
| उत्सृजेत् | त्याग करे |
| सन्निमित्ते | श्रेष्ठ उद्देश्य होने पर |
| वरम् | श्रेयस्कर |
| आचरितव्यम् | आचरण करना चाहिए |
| निस्तारः | ऋण या दायित्व से मुक्ति |
| आयतनम् | मंदिर |
| प्रसीद | प्रसन्न होइए |
| स्वगतम् | मन ही मन |
| साष्टाङ्गम् | साष्टांग प्रणाम करके |
| भृत्यवात्सल्यम् | सेवक के प्रति स्नेह |
| सत्त्वोत्कर्षः | उच्च नैतिक साहस/चरित्र |
| अदर्शनम् | अदृश्य होना |
| महीपतिः | राजा |
| प्रायच्छत् | प्रदान किया |
| समग्रकर्णाटप्रदेशम् | पूरा कर्णाट प्रदेश |
नाट्य-निर्देश
- तच्छ्रुत्वा सानन्दम् — यह सुनकर प्रसन्नतापूर्वक।
- देवीपूजां विधाय — देवी की पूजा करके।
- स्वगतम् — मन में।
- साष्टाङ्गं प्रणिपत्य — साष्टांग प्रणाम करके।
- तं वीक्ष्य — उसे देखकर।
कोष्ठक में लिखे निर्देश अभिनय या पात्र के भाव बताते हैं; उन्हें पात्र द्वारा बोला गया संवाद न समझें।
व्याकरण — वाच्यं त्रिविधम्
१. कर्तृवाच्यम्
कर्त्ता मुख्य होता है और प्रथमा विभक्ति में आता है; क्रिया कर्ता के पुरुष और वचन के अनुसार होती है।
बालकः ग्रामं गच्छति। — बालक गाँव जाता है।
बालकाः पाठं पठन्ति। — बच्चे पाठ पढ़ते हैं।
२. कर्मवाच्यम्
कर्म मुख्य होता है। कर्ता प्रायः तृतीया विभक्ति में और कर्म प्रथमा विभक्ति में होता है। क्रिया कर्म के पुरुष-वचन के अनुसार रूप लेती है।
बालकेन ग्रामः गम्यते। — बालक द्वारा गाँव जाया जाता है।
छात्रेण पाठः पठ्यते। — छात्र द्वारा पाठ पढ़ा जाता है।
छात्रैः पाठाः पठ्यन्ते। — छात्रों द्वारा पाठ पढ़े जाते हैं।
रूप-सूत्र: धातु के साथ प्रायः य और आत्मनेपदी प्रत्यय के माध्यम से कर्मवाच्य रूप बनता है; धातु के अनुसार रूप में परिवर्तन हो सकता है।
३. भाववाच्यम्
अकर्मक धातु के साथ भाववाच्य में कर्ता तृतीया में आता है और क्रिया प्रथमपुरुष एकवचन में रहती है।
बालकेन हस्यते। — बालक द्वारा हँसा जाता है।
बालकैः हस्यते। — बालकों द्वारा हँसा जाता है।
अस्माभिः हस्यते। — हमारे द्वारा हँसा जाता है।
महत्त्वपूर्ण भेद: ‘बालकैः हस्यते’ में बहुवचन कर्ता होने पर भी क्रिया हस्यते ही रहती है।
वाच्य-तुलना
| कर्तृवाच्य | कर्मवाच्य / भाववाच्य |
|---|---|
| रामः पुस्तकं पठति। | रामेण पुस्तकं पठ्यते। |
| बालकाः गीतानि गायन्ति। | बालकैः गीतानि गीयन्ते। |
| बालकः हसति। | बालकेन हस्यते। |
| बालकाः हसन्ति। | बालकैः हस्यते। |
सन्धि-विच्छेद
- जीवितञ्चैव = जीवितम् + च + एव।
- त्यागो = त्यागः (अगले पद के साथ विसर्ग-सन्धि के प्रसंग में)।
- नेदानीम् = न + इदानीम्।
- गताऽदर्शनम् = गता + अदर्शनम्।
- तत्क्षणादेव = तत्क्षणात् + एव।
पाठ्यपुस्तक-अभ्यास के चयनित समाधान
अभ्यास १ — प्रश्ननिर्माणम्
१. वीरवरः पत्नीं पुत्रं दुहितरं च प्राबोधयत्।
प्रश्नः — कः पत्नीं पुत्रं दुहितरं च प्राबोधयत्?
२. ततस्ते सर्वे सर्वमङ्गलायाः आयतनं गताः।
प्रश्नः — ततस्ते सर्वे कस्याः आयतनं गताः?
३. देवी राज्ञः हस्तम् अगृह्णात्।
प्रश्नः — देवी कस्य हस्तम् अगृह्णात्?
४. महीपतिः वीरवराय कर्णाटप्रदेशं प्रायच्छत्।
प्रश्नः — महीपतिः कस्मै कर्णाटप्रदेशं प्रायच्छत्?
अभ्यास २ — सर्वनाम-सन्दर्भ
१. ‘धन्याहं यस्या ईदृशो जनको भ्राता च’ — ‘अहम्’ किसका है?
उत्तरम् — वीरवत्याः।
२. ‘तदेतत्परित्यक्तेन मम राज्येनापि किं प्रयोजनम्’ — ‘मम’ किसका है?
उत्तरम् — शूद्रकस्य।
३. ‘नेदानीं राज्यभङ्गस्ते भविष्यति’ — ‘ते’ किसके लिए है?
उत्तरम् — शूद्रकस्य।
अभ्यास ३ — अन्वयः
१. नेदानीं राज्यभङ्गस्ते भविष्यति।
अन्वयः — इदानीं ते राज्यभङ्गः न भविष्यति।
२. तेन पातितं स्वशिरः स्वकरस्थखड्गेन।
अन्वयः — तेन स्वकरस्थखड्गेन स्वशिरः पातितम्।
३. तदा ममायुःशेषेणापि जीवतु राजपुत्रो वीरवरः सह पुत्रेण पत्न्या दुहित्रा च।
अन्वयः — तदा राजपुत्रः वीरवरः पुत्रेण पत्न्या दुहित्रा च सह मम आयुःशेषेण अपि जीवतु।
४. तत्क्षणादेव देवी गताऽदर्शनम्।
अन्वयः — देवी तत्क्षणात् एव अदर्शनं गता।
५. महीपतिस्तस्मै प्रायच्छत् समग्रकर्णाटप्रदेशं राजपुत्राय वीरवराय।
अन्वयः — महीपतिः तस्मै राजपुत्राय वीरवराय समग्रकर्णाटप्रदेशं प्रायच्छत्।
अतिरिक्त अभ्यास — एकपदेन उत्तराणि
१. वीरवरस्य पुत्रः कः? — शक्तिधरः।
२. वीरवरस्य पत्नी का? — वेदरता।
३. वीरवरस्य दुहिता का? — वीरवती।
४. कस्याः मन्दिरं ते गताः? — सर्वमङ्गलायाः।
५. राजा कस्मै प्रदेशं प्रायच्छत्? — वीरवराय।
अतिरिक्त अभ्यास — पूर्णवाक्येन उत्तराणि
१. वीरवरः गृहं गत्वा कान् प्राबोधयत्?
उत्तरम् — वीरवरः गृहं गत्वा पत्नीं वेदरतां पुत्रं शक्तिधरं दुहितरं वीरवतीं च प्राबोधयत्।
२. देवी सर्वमङ्गला किम् अकरोत्?
उत्तरम् — देवी सर्वमङ्गला राज्ञः हस्तं निवार्य वीरवरं तस्य परिवारं च पुनर्जीवितवती।
३. राजा वीरवराय किं प्रायच्छत्?
उत्तरम् — राजा वीरवराय समग्रकर्णाटप्रदेशं प्रायच्छत्।
अतिरिक्त अभ्यास — बहुविकल्पीय प्रश्न
१. शक्तिधर कौन है? (क) राजा (ख) वीरवर का पुत्र (ग) मंत्री। उत्तर: ख।
२. वेदरता कौन है? (क) वीरवर की पत्नी (ख) देवी (ग) राजलक्ष्मी। उत्तर: क।
३. देवी का नाम क्या है? (क) सरस्वती (ख) सर्वमङ्गला (ग) गंगा। उत्तर: ख।
४. ‘बालकैः हस्यते’ कौन-सा वाच्य है? (क) कर्तृवाच्य (ख) कर्मवाच्य (ग) भाववाच्य। उत्तर: ग।
५. राजा ने वीरवर को क्या दिया? (क) समग्र कर्णाटप्रदेश (ख) घोड़ा (ग) पुस्तक। उत्तर: क।
सामान्य गलतियाँ
- शक्तिधर वीरवर का पुत्र है; वीरवती उसकी पुत्री है।
- वेदरता वीरवर की पत्नी है; सर्वमङ्गला देवी हैं।
- कर्मवाच्य और भाववाच्य एक नहीं हैं; भाववाच्य में अकर्मक धातु तथा एकवचन क्रिया का ध्यान रखें।
- पाठ की कथा को वास्तविक जीवन में आत्महानि या दूसरों को हानि पहुँचाने की प्रेरणा न समझें।
- क-भागः संकट की सूचना तक है; ख-भागः परिवार की प्रतिक्रिया और कथा के समाधान तक।
नैतिक चर्चा
इस कथा में राजा और सेवक दोनों एक-दूसरे के प्रति कृतज्ञ और समर्पित दिखते हैं। आज के संदर्भ में इसका सुरक्षित, उपयोगी संदेश है—दूसरों की सहायता करना, अपने दायित्व निभाना, संकट में विवेक से काम लेना और कमजोर लोगों की रक्षा करना। किसी बच्चे या वयस्क का जीवन ‘बलिदान’ के नाम पर खतरे में डालना स्वीकार्य नहीं है।
त्वरित पुनरावृत्ति
राजा: शूद्रक। सेवक: वीरवर। पुत्र: शक्तिधर। पत्नी: वेदरता। पुत्री: वीरवती। देवी: सर्वमङ्गला। श्लोक: धनानि जीवितञ्चैव...। मुख्य व्याकरण: तीन वाच्य। अंत: परिवार पुनर्जीवित; वीरवर को कर्णाटप्रदेश।
पाठ्यस्रोत और सामग्री-सीमा
प्राथमिक पाठ: NCERT, दीपकम्, कक्षा ८, एकादशः पाठः, मूल अध्याय PDF: https://www.evidyarthi.in/wp-content/uploads/2020/10/cbse-class-8-deepakam-sanskrit-book-chapter-11.pdf । अध्ययन-संदर्भ: https://schools.aglasem.com/ncert-books-class-8-sanskrit-chapter-11/ । चयनित मूल अभ्यास-संदर्भ: https://schools.aglasem.com/ncert-solutions-class-8-sanskrit-chapter-11/ । यहाँ मूल पाठ का स्वतंत्र सार, एक पूर्ण नीति-श्लोक, दूसरे का आशय, व्याकरण, चयनित अभ्यास तथा अलग चिह्नित अतिरिक्त प्रश्न हैं। पुस्तक के सभी सात अभ्यासों के प्रत्येक प्रश्न और दूसरे श्लोक के पूर्ण पाठ का स्वतंत्र शब्दशः मिलान अभी शेष है।
Frequently asked questions
‘सन्निमित्ते वरं त्यागः’ का अर्थ क्या है?
श्रेष्ठ उद्देश्य के लिए किया गया त्याग प्रशंसनीय है। यह नीति-श्लोक का साहित्यिक संदेश है, आत्महानि की सलाह नहीं।
वीरवर की पत्नी, पुत्र और पुत्री के नाम क्या हैं?
पत्नी वेदरता, पुत्र शक्तिधर और पुत्री वीरवती हैं।
ख-भागः में देवी का नाम क्या है?
देवी का नाम सर्वमङ्गला है।
कथा के अंत में क्या होता है?
देवी सर्वमङ्गला वीरवर और उसके परिवार को पुनर्जीवित करती हैं। अगले दिन राजा शूद्रक वीरवर को समग्र कर्णाटप्रदेश देता है।
पाठ 11 का प्रमुख व्याकरण क्या है?
कर्तृवाच्य, कर्मवाच्य और भाववाच्य का अंतर, साथ में प्रश्ननिर्माण और वाक्यान्वय।
भाववाच्य और कर्मवाच्य में क्या अंतर है?
कर्मवाच्य में कर्म प्रधान होता है और क्रिया कर्म के अनुसार बदलती है; भाववाच्य अकर्मक धातुओं से बनता है और क्रिया प्रथमपुरुष एकवचन में रहती है।
